बुधवार, 31 दिसंबर 2008

' चिटठा चर्चा पर 'गाली-पुराण पर शस्त्रार्थ ''

प्रस्तुतकर्ता '' अन्योनास्ति " { ANYONAASTI } / :: कबीरा :: पर 12/31/2008 09:55:00 pm
"गाली पुराण पर शास्त्रार्थ "
लगभग गत दस- पंद्रह दिनों से चिटठा चर्चा पर गालियों पर लिखी गयी एक पोस्ट पर बीहड़ 'शस्त्रार्थ ' चल रहा है कुछ ब्लागरों को उक्त पोस्ट पर आपत्ति है कंही -कहीं लगा कि अधिकांश पुरूष ब्लागरों को विषय पर आपत्ति न होकर इसपर ज्यादा है कि उक्त पोस्ट एक महिला ब्लागर द्वारा लिखा गया है , और महिला ब्लागरों को लग रहा है कि पुरुषों ने जीवन के हर क्षेत्र पर बलात अधिकार जमा कर ''सकल जग पुरूष प्रधान कर राखा , ऊपर ते तरक बढावें सखा " [[तुलसी बाबा से क्षमा निवेदन सहित ]] | आधुनिक तथाकथित बुद्धिजीवी मान्यताओं के अनुसार दोनों पक्ष सही ही हैं |
भारत कि सहिष्णुता विश्व प्रसिद्ध है ,आख़िर क्यों ? मानव मन कि जिन गाठों एवं दमित -भावनाओं कि बात सिगमंड फ्रायड ने इस युग में कही है ,उसके बारे में हमारे मनीषियों ने युगों-युगों पूर्व ही जान और समझ लिया था और उसका इलाज भी सामाजिक -सार्वजानिक कर दिया था !!!???

होली एक ऐसा त्यौहार है जिसमें मानव मन को सार्वजनिक रूप से मन कि भड़ास निकालने कि परम्परा द्वारा अपने मन कि कुंठाएं निकालने कि अनुमति मिली है , परन्तु केवल सार्वजानिक रूप से | इस दिन लोग टोलियों में " कबीर " गाते हुए घूमते हैं |
'' कबीर '' का अर्थ यहाँ कबीर के दोहों से नही ;होली में गाये जाने वाले ये "कबीर '' गाली युक्त दोहे ,चौपाइयां ,कविता होती हैं | जब मन में कोई गांठ नही तो कोई वैमनस्य नही ,ऊपर से 'वसुधैव कुटुम्बकम ' के साथ 'अतिथि देवो भावः '' का जाप |

'' ज़ेर--बहस विषय की भाषा के सन्दर्भ में मेरा जो अध्ययन है ,उसी के आधार पर मेरा कहना है कि उक्त भाषा के कुछ शब्दों का भाव एवं अर्थ दोनो [ दोनों शब्दों की संधि ना कर अलग अलग जानते बूझते लिखा है ] सापेक्षिक होता है ,केवल और केवल किसी विवाद या वास्तविक झगड़े में ही उनके भावार्थ जीवंत होते हैं वारना वे केवल और केवल '' एक'तकिया कलाम '' से अधिक नही होते | "
cm prasad ji एवम् रचना जी दोनो से एक प्रश्न क्या आप लोगों ''तुलसी कृत राम चरित मानस '' का नाम सुना है आशा है सुना भी होगा और उसका पाठ भी किया होगा ?
देखें '' बालकाण्ड ''दोहा संख्या 328 के तुरंत बाद की चौपाई ....
''पॅंच कवल करि जेवन लागे | गारि गान सुन अति अनुरागे || '' [पूर्वार्ध ]||
आगे तीसरी चौपाई का उत्तरार्ध देखें ....
'' जेवंत देहि मधुर धुन गारी | लै लै नाम पुरुष अरु नारी ||'' अगली चौपाई का पूर्वार्ध देंखे ...
'' समय सुहावनि गारि बिराजा | हँसत राउ सुनि सहित समाज़ा || ""
अब मैं दोनो स्वनामधन्य महानुभावो से जानना चाहता हूँ की जो बात समय सापेक्ष भाव और अर्थ पाती हो और हमारे सांस्कृतिक साहित्य का हिस्सा हो क्या उसे आप निकाल फेंक सकते ?
अगर इस प्रकरण का पटाक्षेप ''वर्ष 2008 के अवसान'' के साथ करते हुए , ब्लागीवूड '' सब की मंगल कामना की आकांक्षा एवं भावना के साथ नववर्ष 2009 '' को खुश-आमदीद कहे तो क्या ज़्यादा आनन्ददायक नही होगा ? "सभी को नववर्ष मंगलमय हो "

3 टिप्पणियाँ on "' चिटठा चर्चा पर 'गाली-पुराण पर शस्त्रार्थ ''"

शुभम आर्य on 1 जनवरी 2009 को 1:10 am ने कहा…

नया साल आए बन के उजाला
खुल जाए आपकी किस्मत का ताला|
चाँद तारे भी आप पर ही रौशनी डाले
हमेशा आप पे रहे मेहरबान उपरवाला ||

नूतन वर्ष मंगलमय हो |

राज भाटिय़ा on 1 जनवरी 2009 को 2:40 am ने कहा…

नव वर्ष की आप और आपके परिवार को हार्दिक शुभकामनाएं !!!नया साल आप सब के जीवन मै खुब खुशियां ले कर आये,ओर पुरे विश्चव मै शातिं ले कर आये.
धन्यवाद

PD on 1 जनवरी 2009 को 9:51 am ने कहा…

क्या मेरी नजरें नये साल में कमजोर हो गयी हैं या फिर फौंट ही इतना छोटा है?
खैर नये साल कि ढ़ेरों शुभकामनायें.. :)

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टीपियाने ने पहले पढ़ने के अनुरोध के साथ:
''गंभीर लेखन पर अच्छा,सारगर्भित है ,कहने भर सेकाम नही चलेगा;पक्ष-विपक्ष की अथवा किसी अन्य संभावना की चर्चा हेतु प्रस्तुति में ही हमारे लेखन की सार्थकता है "
हाँ विशुद्ध मनोरनजक लेखन की बात अलग है ; गंभीर लेखन भी मनोरनजक {जैसे 'व्यंग'} हो सकता है '|

वैसे ''पानाला गिराएँ, जैसे चाहे जहाँ, खटोला बिछाएँ
कहाँ यह आप की मर्ज़ी ,आख़िरी खुदा तो आप ही हो ''

 

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